।। जिसे माँ कहा उसे ही काट दिया ।।


 ।।  जिसे माँ कहा उसे ही काट दिया ।।

fallen tree










 क्यों काटा है मुझको
 तेरा मानवता कहां है ।
 मेरे छांव में बैठ के कहा करता था,
 तुम ही मेरी मां है ।

    याद है तुमको जब तुम ,
    उदास हुआ करता था ।
    मेरे छांव में बैठकर घंटों ,
    मुझसे बात किया करता था ।
  
 जब तुम मेरे तन से ,
 लगके बैठा करता था ।
 मां के गोद में बैठा हूं ,
 तुम ऐसा कहा करता था ।
 
    मुझे याद है जब तुम,
    दुख को ढोया करता था ।
    क्या करूं मां मुझे कहकर ,
    कितना रोया करता था ।
    
तेरा  हालत  देख  के ,
मैं भी रोया करता था ।
थके थके मेरे छांव में ,
आकर सोया करता था ।

ये भी पढें :-
·         माँ तू भगवान के हाथों की  
·         ।। याद आया अपना बचपन ।।   


  तूफान से लड़के पवन के झोंको,
   को भी सहा करती थी ।
   खुद धूप में जल के में ,
   तुम्हें छांव दिया करती थी ।

मेरा तन सा खाता हवा में ,
कैसा मानव का सोच था ।
मेरा जड़ था धरती में समाया ,
मैं कहां  किसी पर बोझ था ।

   खत्म कर दिया उस रिश्ता को ,
   जो था सबसे बड़ा दुनिया के।
   उस पर ही कुल्हाड़ी चला दिया ,
   तुम जिसको मां कहते थे ।
                                           
तुम्हें नहीं मालूम तेरा,
कुल्हाड़ी कितना तीखा था।
तुने जितने वार किया मुझ पर ,
मैं उतनी बार चीखा था ।
            
  जड़ से मेरा तन अलग हुआ,
  और मैं गिरा धड़ाम से ।
  टूटा शाखा उड़ा सभी पंछी ,
  फिर मैं सो गया आराम से ।
               
मृत्यु मुकम्मल नींद है जिसमें जाग नहीं आता
    
 Thanks for reading 📝
          Ashok Kumar ✍
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